वो दिल था या घड़ी

याद है तुम्हें वो घड़ी...
जो तुमने मुझे दी थी...
वो आज भी मेरी कलाई पर.
तुम्हारा दिल बनके धड़कती है...
Time का तो पता नहीं...
पर समय आज भी वो ही बताती है...
एहसास होता है उसकी टिक टिक से...
जैसे तुम आज भी मेरे साथ हो..
जब भी तुम्हारी याद आती है...
मैं उसे कान के पास लाकर सुनता हु ..
ऐसा लगता है जैसे उसकी भी धड़कने बड़ गयी..
जैसे तुम्हारी बड़ जाती थी...
जब मैं तुम्हारे सीने पर अपना सिर रख कर
तुम्हारी धड़कनों को सुनता था...
वो आज भी मेरी कलाई पर...
तुम्हारा दिल बनके धड़कती है...
मगर पता नहीं क्यों अब लगता है..
जैसे वो दिल तुम्हारा नहीं था...
जिसकी धड़कने मैं सुनता था...
सायद वो ये बेजान घड़ी थी...
जो पहले तुम्हारे सीने में...
और अब मेरी कलाई पर..
सिर्फ टिक टिक टिक टिक करती है...
क्योंकि अगर तुम्हारे पास दिल होता...
तो शायद मैं अकेले बैठ कर...
तुम्हारी उस घड़ी को देख कर..
तुम्हें याद नहीं करता...
सायद हां सायद तुम्हारे पास दिल नहीं था...
बस वो एक घड़ी थी..
जो सिर्फ टिक टिक टिक करती थीं....
पहले तुम्हारे सीने में..
और अब मेरी कलाई पे....
By : Mani Pathak diwana pathik

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